!! नियति पत्ते की !!
नियति उसकी जाने कौन,
पूछ रहा पत्ते का मौन,
धूली में धूसीत होगा वह, या होगा वह खग शाला।
पेड़ से पत्ता टूट चला।।
वनमाली के आंगन होगा,
या अटके कंटक में होगा,
या सूखे - बिखरे पत्तों में, किसी पशु का निवाला।
पेड़ से पत्ता टूट चला।।
किसी पथ जायेगा बिछ,
या भागेगा हवा खींच,
चुभ जायेगा कंटक बन, या फिरेगा मतवाला।
पेड़ से पत्ता टूट चला।।
खत बनेगा प्रेमी मध्य,
या पृष्ठ स्मृति काव्य मध्य,
या विरह की बदली में, भीगेगा हर बार अकेला।
पेड़ से पत्ता टूट चला।।
कुंठित हो सुख जायेगा,
या पूर्ज़ों में बँट जायेगा,
अंतिम सोपान चढ़ेगा वह, ले रूप अनेकानेक निराला।
पेड़ से पत्ता टूट चला।।
जीवन के क्षणों को देख,
मनुसूत,हे मानव! वह देख,
जीवतरू से जीव टूट गिरा, एकल औ' नितांत अकेला।
पेड़ से पत्ता टूट चला।।
– ©'अनामिका'
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