Saturday, October 16, 2021
माँ! कहो क्या मिलोगी मुझको?
Wednesday, October 13, 2021
!! नियति पत्ते की !!
!! रात एक संगीत है !!
Saturday, September 4, 2021
चार दिन की ज़िंदगी मिली, हँस लूँ या रो लूँ!
बच्चों को खिला लूँ
रिब्बन से बालों में
चोटी बना लूँ
गुथ लूँ यूँ फूलों को
या गजरे लगा लूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
धुल की परतें हटाकर
किताबों में झाकूँ
या बांहे फैलाकर
झुमूं और नाचूँ
चंद लम्हों की खुशियाँ
मैं बाटूँ या रख लूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
लोगों की मैं सुन लूँ
या मन की मैं कर लूँ
या तस्वीर खुद की
कई रंगों से भर लूँ
शब्दों से मैं खेलूँ
या कहानी कोई बुन लूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
चंद सपने आँखों में
रख लूँ सजा लूँ
उम्र गुज़री गुलामी में
वक़्त थोड़ा बिता लूँ
माँ के आँचल में लिपटूँ
या माँ को गोद सुलाऊँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
थोड़े लम्हे ये वक़्त के
वक़्त से मैं चूरा लूँ
या गमगीन लम्हों में
कुछ रंगीन बना लूँ
या इन चार पलों को
यादों में संभालूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
इन झरोखों पर अपनी
आँखें मैं टिका लूँ
भागते वक़्त से मैं
ख़ुद को छिपा लूँ
या सपनों को ज़रा
पलकों पे बिठा लूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
कुछ मन की मैं कर लूँ
थोड़ा हंस लूँ या रो लूँ
बीती गम में जो रातें
या उन रातों को भूलूँ?
या पलभर की ज़िंदगी
मिली उसको मैं जी लूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
या सहने की सबकी
कुछ सांसें मैं भर लूँ
फिर चलने अंगारों पर
मैं साहस भी रख लूँ
वक़्त की आँच पर
तपने को सज लूँ
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
चार दिन की ज़िंदगी मिली,
हँस लूँ या रो लूँ!
– © 'अनामिका'
#चार_दिन_की_जिंदगी_मिली_हँस_लूँ_या_रो_लूँ 🌸
Sunday, August 15, 2021
|| तुझपे मिटने का प्रण हो ||
Thursday, August 12, 2021
|| देखो सावन आया री ||
घन घनघोर छाये व्योम में,
मनभावन बेला लाया री!
झूम-झूम कर बदरा बरसे,
देखो, सावन आया री!
व्योम-धरा मिलन को तरसे,
आ विरह आग बुझाया री!
प्यास शांत कर बदरा बरसे,
देखो, सावन आया री!
धरती का देखो आँचल भीगे,
बदरा बरस बरसाया री!
थिरक-थिरककर बरसे बदरा,
देखो, सावन आया री!
क्यारी - क्यारी फूल खिले,
मधुमय ॠतु बन आया री!
उमड़ घुमड़ कर बदरा गरजे,
देखो, सावन आया री!
देखो, फूलों पर भँवरे गूँजे,
कलिकाएँ भी खिलाया री!
चहुँ ओर ये बदरा बरसे,
देखो, सावन आया री!
गुनगुनाये मंद - मंद हवाएँ,
प्रिय याद संग लाया री!
मन - छंद छू बदरा ये बरसे,
देखो, सावन आया री!
लेकर यादों की बौछारें,
पेडों पर झूले लाया री!
बूँद - बूँद कर बदरा बरसे,
देखो, सावन आया री!
दादुर, कोयल, पिक, पपीहा,
गायें, हरियाली लहराया री!
चारो दिशा पुलकित कर बरसे,
देखो, सावन आया री!
मंद सुगंध छाये चहुँ ओर,
खुशबू सौंधी तैराया री!
मंद - मंद ये बदरा हरसे,
देखो, सावन आया री!
श्री कृष्ण गोपियों संग मगन,
बांसुरी भी शोर मचाया री!
हरस-हरस फिर बदरा बरसे,
देखो, सावन आया री!
शिव शम्भु को हर्षित करने,
शिवा ने बेला-वेणी रचाया री!
लरज - लरज ये बदरा बरसे,
देखो, सावन आया री!
मेरी तुलिका संग मेघों के,
हृदय - हृदय लहराया री!
मंद - मंद ये बदरा गरजे,
देखो, सावन आया री!
–©अनामिका
#देखो_सावन_आया_री #सावन #बारिश
!! लेकिन फिर भी तुम ना आये !!
हर बार प्रिय लिख जाते थे !
बहती हवा के झोंके से,
जो पत्ते उड़ आते थे।
उन पत्तों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिये लिख जाते थे।
तपती गर्मी के मौसम में,
जो सूरज शीश पे आता था।
मेरे नंगे पांव के छालों में,
इंतज़ार तुम्हारा दिखता था।
मंदिर की वो घंटे की गुंज,
जो प्रार्थना संग बज उठते थे।
हर उस लय पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
उपवन की हर एक कुसुम,
खुशबू तुम्हारी बिखराती थी।
मंद - मंद सी खुशबू सारी,
संग याद तुम्हारी लाती थी।
फूलों की गिरी पंखुड़ियां जब,
उड़ हवाओं संग आ जाते थे।
उन पंखुड़ियों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
ढ़लते सूरज की तपिश जब,
गोधुलि बेला ले आता था।
डूबते सूरज की लालिमा में,
बिंब तुम्हारा दिख जाता था।
चढ़ती निशा के साथ - साथ,
जब चंद्र गगन में आते थे।
शीतल व्योम में नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
रात्रि की हर एक पहर,
प्रिय याद तुम्हारी लाती थी।
मन के हर एक पन्ने पर,
नाम तुम्हारा लिख जाती थी।
बहती हवा जब झोंके से,
मेरे झरोखे पर आ जाते थे।
हर उन झोंकों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
यादों की बारिश जब भी,
मेरे मन के छत पर होती थी।
हर उन बूंदों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाती थी।
हर बार प्रिय लिख जाती थी।।
— ©अनामिका
#हर_बार_प्रिय_लिख_जाते_थे...
पूछती है हस्तरेखा..अब और कितना इंतज़ार?
देखते हैं नेत्र तुमको
अपलक करते निहार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
दृग्जल पखारते हैं
पग तुम्हारे बार - बार
मैं पूछती , संबंध तुमसे
आप कहती, तुम आराध्य!
सुरभित नीलाभ है
पर भू ओढ़े विसाद
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
कालचक्र में पिसती
उकेरती कई नयी आकार
देखती.......निहारती......
मैं हस्तरेखा बार - बार।
नभ - मेघ सम बरसती
पीड़ा उर की बार - बार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
हे प्रिय ! इसमें कहां..
मिलन होता एकाकार?
दो हृदय को जोड़ती
हस्तरेखा एक साथ?
वेदना से पूर्ण उर में
प्रेम प्राणों का आधार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
हे प्रिय ! अब लौट आओ
मौन को दे दो संवाद
हृदय के मर्म वेदना को
दो हृदय से उच्छवास।
हृदय की चिर वेदना
त्यागती हर अलंकार
पूछती है प्रश्न तुमसे
आओगे कब,हे निराकार?
वियोगिनी सी प्रतीक्षारत मैं
कर रही स्मृति निहार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
–©अनामिका
#कृष्ण_प्रेम #कृष्ण_मेरे #कविताएं_मेरा_दर्पण
#पूछती_है_हस्तरेखा_अब_और_कितना_इंतज़ार
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ !
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ
गुमनाम नहीं अधिकारी हूँ
तुम पेट पालनेवाले खुद के
मैं जगत पालने वाली हूँ
मैं जगत पालने वाली हूँ।
भू जीवन का सार हूँ मैं
इस सृष्टि का विस्तार हूँ मैं
आदि से लेकर अवसान तक
प्रचंड सूर्य की लाली हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
नाकाम नहीं न हारी हूँ
तुम एक-एक पर भारी हूँ
अंधियारे में ज्योति बनकर
जलती पावक चिंगारी हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
अग्नि में खिलती सीता हूँ
श्री हरि की पावन गीता हूँ
चौपड़ में हारी कृष्णा मैं
मैं ही पद्मिनी क्षत्राणि हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
मैं ही कृष्ण दीवानी राधा हूँ
मैं ही भारत माता हूँ
मैं प्रेम की भाषा सिखलाती
मैं ही माँ मैं धात्री हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
मर्यादा का ज्ञान हूँ मैं
न बंध सकूँ वो आग हूँ मैं
बेड़ी में बंधी परवाज़ नहीं
मैं उड़ने की अधिकारी हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
जीवन अमृत की धार हूँ मैं
नभ-मेघों का बौछार हूँ मैं
भरूँ प्राण मैं रक्त-दुग्ध से
और मैं ही मात कृपाली हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
माया का गहरा जाल हूँ मैं
अधर्मीयों का काल हूँ मैं
श्री हरि कण्ठ की माला मैं
श्री हरि की कुमकुम रोली हूँ
वस्तु नहीं मैं नारी हूँ।
–© अनामिका
#वस्तु_नहीं_मैं_नारी_हूँ #नारी
Wednesday, August 11, 2021
🌺 सरस्वती वंदना 🌺
हे माँ वाणी! सप्तसूरधारिनी
स्तुति योग्य तू वाणी स्वर दे!
वीणा के हर तान में तू माँ
सृष्टि के निर्माण में तू माँ
आत्म से ब्रम्ह ज्ञान में तू माँ
श्री नारायण ध्यान में तू माँ
हे माँ वाणी ! विद्यादायिनी
स्तुति योग्य तू वाणी स्वर दे।
त्रिमूर्ति की शक्ति तू माँ
गीता की उक्ति में तू माँ
वेदों की सूक्ति में तू माँ
दुर्गुण से मुक्ति में तू माँ
हे माँ वाणी! कष्टनिवारिनी
स्तुति योग्य तू वाणी स्वर दे।
सुसंस्कृति उत्थान में तू माँ
कालचक्र निर्वाण में तू माँ
बाद देह अवसान में तू माँ
आत्मचक्र सोपान में तू माँ
हे माँ वाणी ! जगतारिनी
स्तुति योग्य तू वाणी स्वर दे।
छंद - बंध के ज्ञान में तू माँ
देवर्षि के गान में तू माँ
वाल्मिकी तपोध्यान में तू माँ
गणपति के प्राण में तू माँ
हे माँ वाणी!त्रिलोकनिवासिनी
स्तुति योग्य तू वाणी स्वर दे।
सुंदर मोहक काया तुम्हारी
जग पे बरसे माया तुम्हारी
तू अनंता , सुपथगामिनी
रहे सदा यूँ छाया तुम्हारी
हे माँ वाणी ! वरदायिनी
स्तुति योग्य तू वाणी स्वर दे।
— ©अनामिका
" वो आहुति मेरी हो। "
चाहे विडंबना जैसी हो पर माँ चरणों में तेरी वो आहुति मेरी हो.. हो कुंठाओं से ग्रसित समय या कोलाहल में लिपटा लय मृत्य...







