बहती हवा के झोंके से,
जो पत्ते उड़ आते थे।
उन पत्तों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिये लिख जाते थे।
तपती गर्मी के मौसम में,
जो सूरज शीश पे आता था।
मेरे नंगे पांव के छालों में,
इंतज़ार तुम्हारा दिखता था।
मंदिर की वो घंटे की गुंज,
जो प्रार्थना संग बज उठते थे।
हर उस लय पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
उपवन की हर एक कुसुम,
खुशबू तुम्हारी बिखराती थी।
मंद - मंद सी खुशबू सारी,
संग याद तुम्हारी लाती थी।
फूलों की गिरी पंखुड़ियां जब,
उड़ हवाओं संग आ जाते थे।
उन पंखुड़ियों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
ढ़लते सूरज की तपिश जब,
गोधुलि बेला ले आता था।
डूबते सूरज की लालिमा में,
बिंब तुम्हारा दिख जाता था।
चढ़ती निशा के साथ - साथ,
जब चंद्र गगन में आते थे।
शीतल व्योम में नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
रात्रि की हर एक पहर,
प्रिय याद तुम्हारी लाती थी।
मन के हर एक पन्ने पर,
नाम तुम्हारा लिख जाती थी।
बहती हवा जब झोंके से,
मेरे झरोखे पर आ जाते थे।
हर उन झोंकों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाते थे।
यादों की बारिश जब भी,
मेरे मन के छत पर होती थी।
हर उन बूंदों पर नाम तुम्हारा,
हर बार प्रिय लिख जाती थी।
हर बार प्रिय लिख जाती थी।।
— ©अनामिका
#हर_बार_प्रिय_लिख_जाते_थे...

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