देखते हैं नेत्र तुमको
अपलक करते निहार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
दृग्जल पखारते हैं
पग तुम्हारे बार - बार
मैं पूछती , संबंध तुमसे
आप कहती, तुम आराध्य!
सुरभित नीलाभ है
पर भू ओढ़े विसाद
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
कालचक्र में पिसती
उकेरती कई नयी आकार
देखती.......निहारती......
मैं हस्तरेखा बार - बार।
नभ - मेघ सम बरसती
पीड़ा उर की बार - बार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
हे प्रिय ! इसमें कहां..
मिलन होता एकाकार?
दो हृदय को जोड़ती
हस्तरेखा एक साथ?
वेदना से पूर्ण उर में
प्रेम प्राणों का आधार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
हे प्रिय ! अब लौट आओ
मौन को दे दो संवाद
हृदय के मर्म वेदना को
दो हृदय से उच्छवास।
हृदय की चिर वेदना
त्यागती हर अलंकार
पूछती है प्रश्न तुमसे
आओगे कब,हे निराकार?
वियोगिनी सी प्रतीक्षारत मैं
कर रही स्मृति निहार
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
पूछती है हस्तरेखा
अब और कितना इंतज़ार?
–©अनामिका
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