अंतस तम की विकल वेदना,
जब आंखों में तैरती आई,
हुआ खंडित हृदय टुकड़ों में,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
मौसम ने करवट यूँ बदला,
सर्द गर्म आया फिर गीला,
रेतघड़ी भी ली अंगडाई,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
बीत गए दिन सालों में,
दीवारों पर पपड़ी आई,
उकेरा तुमको! कई नक्शों में,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
नीला अंबर भी सोया,
ढली शाम भी ली जमुहाई,
जली आँखें भी इंतज़ार में,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
यूँ दिल में बंद पुलिंदों से,
जब माज़ी ने उधार मंगवाई,
तैरीं यादें फिर आंखों में,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
यूँ कई दफ़े हवाएँ भी,
खिड़की खोल कर आईं,
रखी मेज़ पर खत पढ़ डाले,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
जुमले अंतर में छिप बैठीं,
नोक कलम की भी टूटी,
चिपक गये लफ्ज़ होठों पे,
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
लेकिन फिर भी तुम ना आये!
—©अनामिका
#लेकिन_फिर_भी_तुम_ना_आये

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